यह भजन माँ महाकाली के उग्र, शक्तिशाली और रक्षक स्वरूप का भव्य चित्रण करता है। इसमें अमावस्या की रात्रि को प्रतीक बनाकर यह दिखाया गया है कि जब संसार अंधकार में डूबा होता है, तब माँ काली अपने भयावह रूप में अधर्म का नाश करने निकलती हैं।
भजन में माँ काली को काल भैरव, योगिनियों और दिव्य शक्तियों के साथ दिखाया गया है, जो यह दर्शाता है कि वे केवल संहार की देवी नहीं, बल्कि भय से मुक्ति और न्याय की प्रतीक हैं।
यह भजन शक्ति उपासना, तांत्रिक परंपरा और भक्तिभाव — तीनों का अद्भुत संगम है।
यह रचना विशेष रूप से अमावस्या, काली पूजा, भैरव अष्टमी और रात्रि साधना में गाई जाती है।

काली काली अमावस की रात में भजन लिरिक्स
काली काली महाकाली,
काली काली महाकाली,
काली काली अमावस की रात में,
काली निकली काल भैरव के साथ में ॥
ये अमावस की रात बड़ी काली,
ये अमावस की रात बड़ी काली,
घूमने निकली माता महाकाली,
घूमने निकली माता महाकाली,
एक दानव का मुंड लिए हाथ में,
एक दानव का मुंड लिए हाथ में,
काली काली अमावस की रात मे,
काली काली अमावस की रात मे,
काली निकली काल भैरव के साथ में ॥
केश बिखरे माँ के काले काले,
केश बिखरे माँ के काले काले,
नैना मैया के हैं लाले लाले,
नैना मैया के हैं लाले लाले,
काला कुत्ता भैरव जी के साथ में,
काला कुत्ता भैरव जी के साथ में,
काली काली अमावस की रात मे,
काली काली अमावस की रात मे,
काली निकली काल भैरव के साथ में ॥
रूप भैरव जी का काला काला,
रूप भैरव जी का काला काला,
ये तो है मैया काली का लाला,
ये तो है मैया काली का लाला,
बेटा घूमने चला माँ के साथ में,
बेटा घूमने चला माँ के साथ में,
काली काली अमावस की रात मे,
काली काली अमावस की रात मे,
काली निकली काल भैरव के साथ में ॥
बावन भैरव और छप्पन है करुआ,
बावन भैरव और छप्पन करुआ,
साथ सौ सौगन खेल रहो बरुआ,
साथ सौ सौगन खेल रहो बरुआ,
चौंसठ जोगिनया मैया के साथ में,
चौंसठ जोगिनया मैया के साथ में,
काली काली अमावस की रात मे,
काली काली अमावस की रात मे,
काली निकली काल भैरव के साथ में ॥
माता काली के मुख से निकले ज्वाला,
माता काली के मुख से निकले ज्वाला,
गले पहने है मुंडों की माला,
गले पहने है मुंडों की माला,
है रूह काँपे है राही के रात में,
है रूह काँपे है राही के रात में,
काली काली अमावस की रात मे,
काली काली अमावस की रात मे,
काली निकली काल भैरव के साथ में ॥
काली काली महाकाली,
काली काली महाकाली,
काली काली अमावस की रात में,
काली निकली काल भैरव के साथ में ॥
भजन का भावार्थ (सरल शब्दों में)
इस भजन का भाव यह बताता है कि —
अमावस्या की अंधेरी रात में माँ महाकाली अपने उग्र रूप में प्रकट होती हैं।
उनका यह रूप डराने के लिए नहीं, बल्कि असुर शक्तियों का नाश करने और भक्तों की रक्षा के लिए होता है।
माँ के खुले केश, रक्तिम नेत्र और मुंडमाला यह दर्शाते हैं कि—
- अहंकार का अंत निश्चित है
- अधर्म टिक नहीं सकता
- माँ की शक्ति असीम है
काल भैरव उनके साथ चल रहे हैं, जो यह संकेत देते हैं कि काल (समय) भी माँ के अधीन है।
योगिनियाँ और भैरव गण यह दर्शाते हैं कि संपूर्ण ब्रह्मांडीय शक्ति माँ के साथ है।
भजन का सार यही है कि— 👉 जब जीवन में अंधकार हो
👉 जब भय और संकट घेर लें
👉 तब माँ काली की शरण ही सबसे बड़ा सहारा है
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. यह भजन किस देवी को समर्पित है?
यह भजन माँ महाकाली और काल भैरव को समर्पित है।
2. भजन में “अमावस की रात” का क्या अर्थ है?
अमावस्या यहाँ अज्ञान, भय और अंधकार का प्रतीक है, जहाँ माँ काली शक्ति बनकर प्रकट होती हैं।
3. यह भजन कब गाया जाता है?
✔️ काली पूजा
✔️ अमावस्या की रात्रि
✔️ भैरव अष्टमी
✔️ रात्रि जागरण व साधना में
4. क्या यह भजन डरावना है?
नहीं। यह भजन भय दूर करने वाला है।
माँ का उग्र रूप बुराई के विनाश और भक्तों की रक्षा का प्रतीक है।
5. इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?
👉 जब संसार अंधकारमय हो, तब माँ काली स्वयं प्रकाश बनती हैं।
उनकी भक्ति से भय, संकट और नकारात्मक शक्तियाँ दूर हो जाती हैं।