“करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं, स्वीकार करो माँ” एक अत्यंत भावपूर्ण माता रानी का भजन है, जो भक्त और माँ दुर्गा के बीच के गहरे विश्वास, समर्पण और श्रद्धा को दर्शाता है। इस भजन में एक भक्त अपने व्रत, तप और भक्ति को माँ के चरणों में अर्पित करते हुए उनसे कृपा की प्रार्थना करता है।

यह भजन विशेष रूप से नवरात्रि, व्रत-उपवास, जगराता और माता के भक्ति आयोजनों में गाया जाता है। इसके शब्द सरल होते हुए भी हृदय को छू लेने वाले हैं, जो हर भक्त को माँ के और निकट ले जाते हैं।
माँ के प्रति पूर्ण आस्था और विश्वास रखने वालों के लिए यह भजन आध्यात्मिक शक्ति, धैर्य और शांति प्रदान करता है।

करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं स्वीकार करो माँ लिरिक्स
करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं,
स्वीकार करो माँ,
मझधार में, मैं अटकी,
बेडा पार करो माँ,
बेडा पार करो माँ,
हे माँ संतोषी, माँ संतोषी ॥
बैठी हूँ बड़ी आशा से,
तुम्हारे दरबार में,
क्यूँ रोये तुम्हारी बेटी,
इस निर्दयी संसार में,
पलटा दो मेरी भी किस्मत,
पलटा दो मेरी भी किस्मत,
चमत्कार करो माँ ।
मझधार में, मैं अटकी,
बेडा पार करो माँ,
बेडा पार करो माँ,
हे माँ संतोषी, माँ संतोषी ॥
मेरे लिए तो बंद है,
दुनिया की सब राहें,
कल्याण मेरा हो सकता है,
माँ आप जो चाहें,
चिंता की आग से मेरा,
चिंता की आग से मेरा,
उद्धार करो माँ ।
मझधार में, मैं अटकी,
बेडा पार करो माँ,
बेडा पार करो माँ,
हे माँ संतोषी, माँ संतोषी ॥
दुर्भाग्य की दीवार को,
तुम आज हटा दो,
मातेश्वरी वापिस मेरे,
सौभाग्य को ला दो,
इस अभागिनी नारी से,
इस अभागिनी नारी से,
कुछ प्यार करो माँ ।
मझधार में, मैं अटकी,
बेडा पार करो माँ,
बेडा पार करो माँ,
हे माँ संतोषी, माँ संतोषी ॥
करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं,
स्वीकार करो माँ,
मझधार में, मैं अटकी,
बेडा पार करो माँ,
बेडा पार करो माँ,
हे माँ संतोषी, माँ संतोषी ॥
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. “करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं” भजन किसे समर्पित है?
यह भजन माँ दुर्गा / माता रानी को समर्पित है।
2. इस भजन का मुख्य भाव क्या है?
समर्पण और विश्वास
भक्त माँ से कहता है कि उसने श्रद्धा से व्रत रखा है और माँ से अपनी भक्ति स्वीकार करने की विनती करता है।