मुझे दास बनाकर रख लेना भगवान तू अपने चरणों में लिरिक्स | Mujhe Das Bana Kar Rakh Lena Bhagwan Tu Apni Charno Mein Lyrics

“मुझे दास बनाकर रख लेना भगवान, तू अपने चरणों में” एक अत्यंत भावुक और विनम्र भक्ति भजन है, जिसमें भक्त ईश्वर से कोई वैभव, सिद्धि या पद नहीं, बल्कि अपने चरणों में दासत्व की प्रार्थना करता है। यह भजन पूर्ण समर्पण, अहंकार-त्याग और निष्काम भक्ति का प्रतीक है।

इस भजन में यह भाव स्पष्ट रूप से झलकता है कि सच्चा सुख और शांति केवल ईश्वर की सेवा में है। भक्त स्वयं को छोटा मानकर भगवान के चरणों में स्थान चाहता है और जीवन भर उनकी भक्ति में लगे रहने की कामना करता है।

सत्संग, भजन संध्या, एकादशी, और ध्यान-भक्ति के समय यह भजन मन को गहरी शांति और आत्मिक संतोष प्रदान करता है।
  Mujhe Das Bana Kar Rakh Lena Bhagwan Tu Apni Charno Mein Lyrics

मुझे दास बनाकर रख लेना भगवान तू अपने चरणों में लिरिक्स


मुझे दास बनाकर रख लेना,
भगवान तू अपने चरणों में,
भगवान तू अपने चरणों में,
भगवान तू अपने चरणों में,
मुझें दास बनाकर रख लेना,
भगवान तू अपने चरणों में ॥

तर्ज – अब सौंप दिया इस।

मैं भला बुरा हूँ तेरा हूँ,
मैं भला बुरा हूँ तेरा हूँ,
तेरे द्वार पे डाला डेरा हूँ,
तेरे द्वार पे डाला डेरा हूँ,
मुझे चाकर जान के रख लेना,
मुझे चाकर जान के रख लेना,
भगवान तू अपने चरणों में,
मुझें दास बनाकर रख लेना,
भगवान तू अपने चरणों में ॥

जब अधम से अधम को तारा है,
जब अधम से अधम को तारा है,
उसमे ही नाम हमारा है,
उसमे ही नाम हमारा है,
मुझे भार समझ कर रख लेना,
मुझे भार समझ कर रख लेना,
भगवान तू अपने चरणों में,
मुझें दास बनाकर रख लेना,
भगवान तू अपने चरणों में ॥

मुझे दास बनाकर रख लेना,
भगवान तू अपने चरणों में,
भगवान तू अपने चरणों में,
भगवान तू अपने चरणों में,

मुझें दास बनाकर रख लेना,
भगवान तू अपने चरणों में ॥


भजन का भावार्थ (सरल शब्दों में)


यह भजन भक्त के हृदय की सच्ची पुकार है। इसमें भक्त भगवान से यह नहीं कहता कि उसे धन, पद या प्रसिद्धि चाहिए, बल्कि वह केवल इतना चाहता है कि उसे भगवान के चरणों में स्थान मिल जाए।

भक्त स्वयं को दास मानते हुए कहता है कि यदि जीवन भर भगवान की सेवा करने का अवसर मिल जाए, तो वही उसके लिए सबसे बड़ा सौभाग्य है।

इस भजन का भाव यह सिखाता है कि जब मनुष्य अपना अहंकार त्याग देता है और स्वयं को पूरी तरह ईश्वर को समर्पित कर देता है, तभी उसे सच्ची शांति और संतोष प्राप्त होता है। भगवान के चरणों में दास बन जाना ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। 

दास्य भक्ति का अर्थ


दास्य भक्ति भक्ति के नौ प्रकारों में से एक प्रमुख रूप है, जिसमें भक्त स्वयं को भगवान का सेवक (दास) मानता है। इस भक्ति मार्ग में अहंकार, स्वार्थ और अपेक्षाओं का स्थान नहीं होता — केवल सेवा, श्रद्धा और आज्ञा पालन ही मुख्य भाव होते हैं।

हनुमान जी की राम भक्ति, लक्ष्मण जी की सेवा भावना और संतों की विनम्रता दास्य भक्ति के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। दास्य भक्ति मनुष्य को नम्र बनाती है और उसे यह सिखाती है कि ईश्वर की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।

जब भक्त स्वयं को भगवान का दास मान लेता है, तब उसका जीवन सरल, शांत और पवित्र हो जाता है। यही दास्य भक्ति का वास्तविक सार है।

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न


1. “मुझे दास बनाकर रख लेना” भजन किस भाव पर आधारित है?

यह भजन दास्य भाव, पूर्ण समर्पण और निष्काम भक्ति पर आधारित है।

2. यह भजन किस भगवान को समर्पित है?

यह भजन ईश्वर के सार्वभौमिक स्वरूप को समर्पित है — इसे राम, कृष्ण, हरि या नारायण किसी भी रूप में गाया जा सकता है।

3. यह भजन कब गाना या सुनना श्रेष्ठ माना जाता है?

  • ✔️ सत्संग और भजन-कीर्तन
  • ✔️ एकादशी
  • ✔️ प्रातःकाल या संध्या भक्ति
  • ✔️ ध्यान और आत्मचिंतन के समय

4. इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?

👉 भगवान की शरण में ही जीवन का सार है
जब अहंकार समाप्त होता है, तभी सच्ची भक्ति प्रारंभ होती है।

5. क्या यह भजन नए भक्तों के लिए उपयुक्त है?

हाँ, यह भजन सरल शब्दों और गहरे भाव के कारण नए और अनुभवी — दोनों भक्तों के लिए अत्यंत उपयुक्त है।


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