"शीतला शीतला कहिके” एक प्रसिद्ध और श्रद्धापूर्ण माता शीतला का भजन है, जिसे विशेष रूप से उत्तर भारत, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में गाया जाता है। यह भजन माता शीतला की कृपा, शांति और रोग-निवारण शक्ति को समर्पित है।
माता शीतला को चेचक, बुखार और संक्रामक रोगों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। इस भजन में भक्त माता को पुकारते हैं और उनसे अपने परिवार व समाज की रक्षा की प्रार्थना करते हैं। सरल शब्दों और लोकभाषा में रचित होने के कारण यह भजन लोक आस्था और परंपरा से गहराई से जुड़ा हुआ है।
विशेष रूप से शीतला अष्टमी, बसोड़ा पर्व, चैत्र मास और महामारी के समय यह भजन घर-घर गाया जाता है। यह भजन न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत करता है, बल्कि मन में विश्वास, धैर्य और सकारात्मक ऊर्जा भी भरता है।


शीतला शीतला कहिके लिरिक्स
शीतला शीतला कहिके, तोलामनावंव वो,
आगे असाढ़ के महिना, चोला जुड़ावंव वो,
कारज मोरो सादे....तोर भरोसा हावंव वो,
आगे असाढ़ के महिना, चोला जुड़ावंव वो......
जब-जब आंखी मुदौं, दरस तोर पाथौवो,
हिरदे मा भगति उमचथे, रहि-रहि सोरियाथैं वो,
गुनत रथौं तोरे गुन ला, अतकेच सहंराधं वो,
बुड़े रहीं तोरे भजन मा, कहिके गोहराथें वो,
दसो अंगरी बिनती हे...तोही ला सुनावंव वो,
आगे असाढ़ के महिना, चोला जुड़ावंव वो......
महिना असाढ़ मा कहिथे, शीतला ला मनाले वो,
पबरित धरम गंगा मा, बुड़की लगाले वो,
भागमानी काया मिले हे, यहु ला फरियाले,
सातो पुरखा के भाग ला, उंचहा बनाले वो,
परन करे हंव ढाई...तोर अंचरा पाव्ंव को,
आगे असाढ़ के महिना, चोला जुड़ावंव वो......
दिन बादर देखके सुध्घर, जोखवा ला मढ़ायेंव वो,
शीतला जुड़वास करे के, उद़िम ला रचायंव वो,
गाँव के सगरो देवता ला, नेवता भेजायेंव वो,
पुरखा के चलाये चलन मा, आस ला लमायेंव वो,
इन आवय कोनो अलहन...चाउंर बंधावंव को,
आगे असाढ़ के महिना, चोला जुड़ावंव वो......
चौखडिया चउ पुराके, पिदुलीरखायें वो,
आवौ-आवौ बइठव मइया, आसन लगायेंव वो,
कांसा के कलसा सजाके, दियना जलायंव वो,
गंगाजल अचमन करके, बरत ला उचायंव वो,
तीन रंग के धजा हे...लहर लहरावंव वो,
आगे असाढ़ के महिना, चोला जुड़ावंव वो......
कांचा-कोंवर हरदी पीसके, तीली तेल मिलायेंव वो,
तन भर तब शीतला ढाई के, मन भर चुपरायेंव वो,
नवा बस्तर पहिराके, अंगा-अंग ला सजायेंव वो,
पूजा के नरियर भेला, सरथाले चढ़ायेंव वो,
लीमडारा के सुध्यर... में चंवर डोलायेंव वो,
आगे असाढ़ के महिना, चोला जुड़ावंव वो......
कलिजुगिहा जीव के परन हे, सेवा बर दाई के,
कांचा पाका जुड़-जुड़ जेवन, भोग महामाई के,
पोरसाये हावय सथरा, लीमहिन बिमलाई के,
पावौ परसादी जननी, मया बढ़हाई के,
भूल चूक छमा करबे... घेरी-बेरी गोहरावंव वो,
आगे असाढ़ के महिना, चोला जुड़ावंव वो......
तोरे किरपा ले जगत के, चलथे जिनगानी वो,
काया ला शीतल करदे, बर्सादे पानी वो,
अनहर उपजही तभे वो, होही ज़ किसानी वो,
पेट के भूख हा मिटही, पाही सुख परानी वो,
उड़ान- गौतम अरज लगाये.. इंहिचे थिरियावंव वो,
आगे असाढ़ के महिना, चोला जुड़ावंव वो......
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. “शीतला शीतला कहिके” भजन किस देवी से संबंधित है?
यह भजन माता शीतला को समर्पित है।
2. माता शीतला का क्या महत्व है?
माता शीतला को रोगों से रक्षा करने वाली और शीतलता प्रदान करने वाली देवी माना जाता है।
3. यह भजन कब गाया जाता है?
यह भजन विशेष रूप से शीतला अष्टमी, बसोड़ा पर्व, चैत्र माह और पूजा-पाठ के समय गाया जाता है।
4. इस भजन का मुख्य भाव क्या है?
इस भजन का मुख्य भाव श्रद्धा, प्रार्थना और रोग-निवारण की कामना है।
5. क्या यह भजन घर में गाया जा सकता है?
हाँ, यह भजन घर, मंदिर और सामूहिक पूजा सभी स्थानों पर गाया जा सकता है।
6. इस भजन को गाने या सुनने से क्या लाभ माना जाता है?
मान्यता है कि इससे मन को शांति, भय से मुक्ति और माता की कृपा प्राप्त होती है।
7. क्या यह भजन सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए उपयुक्त है?
हाँ, यह भजन बच्चों, युवाओं और बुज़ुर्गों सभी के लिए उपयुक्त है।
निष्कर्ष
“शीतला शीतला कहिके” भजन लोक आस्था, विश्वास और माता शीतला की करुणा का सुंदर प्रतीक है। यह भजन भक्तों को भय से मुक्त कर माता की शरण में ले जाने का माध्यम बनता है।