“नर तन फेर ना मिलेगो रे” एक अत्यंत गूढ़ और आत्मबोध कराने वाला वैराग्य भजन है, जो मानव जीवन की नश्वरता और आत्मा की यात्रा को बड़े ही सशक्त शब्दों में समझाता है। यह भजन संत परंपरा की उस शिक्षा को दर्शाता है जिसमें मनुष्य को यह याद दिलाया जाता है कि मानव जन्म बार-बार नहीं मिलता।
इस भजन में जीवन की सच्चाई, माया का जाल, मोह-ममता, अहंकार और अंततः मृत्यु की अनिवार्यता को बहुत सरल लेकिन प्रभावशाली भाषा में बताया गया है। यह भजन सुनकर मनुष्य अपने कर्मों पर विचार करने को विवश हो जाता है।
यह भजन विशेष रूप से सत्संग, भजन-कीर्तन और वैराग्य प्रसंगों में गाया जाता है।

नर तन फेर ना मिलेगो रे लिरिक्स
नर तन फेर ना मिलेगो रे, बांधे क्यों गठड़िया प्राणी पाप की,
बड़े भाग मानुष तन पायो भटक भटक चौरासी,
अब के दाव चूक जाए बंदे फेर पड़े गल फांसी,
डंडा पीठ पे पड़ेगा ये , बांधे क्यों गठड़िया...
दिन ऊगे से दिन डूबे तक बेहद करें कमाई,
छोरा छोरी की लालच में महल दिये बनवाई,
इनमें कैसे तो रहेगो रे , बांधे क्यों गठड़िया.......
माया के मद में आकर के,रोज मचावे दंगा,
एक दिन मरघट बीच ले जाएंगे कुटुम्ब करें तोय नंगा,
वा दिन चौड़े में फुकेगो रे ,बांधे क्यों गठड़िया......
देहरी तक तेरी तिरिया रोवे पोरी तक तेरी मैया,
तेरह दिन तक याद रहेगी कहे कबीर समझैया,
नाता यही तक रहेगो रे, बांधे क्यों गठड़िया.......
भजन का भावार्थ (सरल शब्दों में)
इस भजन का मूल भाव यह है कि —
👉 मनुष्य का शरीर बार-बार नहीं मिलता।
यह बहुत पुण्य कर्मों से प्राप्त होता है, इसलिए इसे व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।
भजन में बताया गया है कि:
- मनुष्य दिन-रात धन कमाने में लगा रहता है
- परिवार, पुत्र, संपत्ति और सुख में उलझा रहता है
- पाप और अहंकार की गठरी बाँधता चला जाता है
लेकिन अंत समय में —
- न धन साथ जाता है
- न परिवार
- न शरीर
शमशान तक केवल शरीर जाता है,
और आत्मा को अपने कर्मों का फल अकेले भोगना पड़ता है।
भजन यह भी सिखाता है कि — 👉 माया के मद में मत फँसो
👉 ईश्वर का नाम ही सच्चा सहारा है
👉 आज ही संभल जाओ, कल देर हो सकती है
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. “नर तन फेर ना मिलेगो रे” भजन किस विषय पर आधारित है?
यह भजन वैराग्य, आत्मबोध और कर्मफल पर आधारित है।
2. इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?
👉 मानव जीवन अनमोल है, इसे व्यर्थ मत गँवाओ।
ईश्वर भक्ति और सत्कर्म ही जीवन का असली उद्देश्य है।
3. यह भजन कब गाया जाता है?
✔️ सत्संग में
✔️ भजन-कीर्तन में
✔️ आध्यात्मिक प्रवचनों में
✔️ वैराग्य भाव के अवसर पर
4. क्या यह भजन डराने वाला है?
नहीं। यह भजन जगाने वाला है।
यह मनुष्य को सच्चाई दिखाकर सही मार्ग पर लाने का प्रयास करता है।
5. इस भजन से हमें क्या सीख मिलती है?
✔️ जीवन क्षणभंगुर है
✔️ कर्म ही साथ जाते हैं
✔️ अहंकार त्यागो
✔️ ईश्वर स्मरण करो
✔️ समय रहते संभल जाओ
निष्कर्ष
“नर तन फेर ना मिलेगो रे” केवल भजन नहीं, बल्कि जीवन का आईना है। यह हमें याद दिलाता है कि जो आज हमारे पास है, वह कल नहीं रहेगा। इसलिए इसी जीवन में भक्ति, सत्कर्म और सच्चाई का मार्ग अपनाना ही सबसे बड़ा धर्म है।