“चदरिया झीनी रे झीनी” संत कबीर दास जी का अत्यंत प्रसिद्ध और गूढ़ अर्थ वाला भजन है, जो मानव जीवन की नश्वरता और आत्मा की पवित्रता को बड़े सरल शब्दों में समझाता है। इस भजन में कबीर जी ने मानव शरीर को एक चादर के रूप में दर्शाया है, जिसे ईश्वर ने अत्यंत शुद्ध और कोमल बनाकर हमें सौंपा है।

यह भजन हमें याद दिलाता है कि यह जीवन बहुत अनमोल है, लेकिन हम अपने कर्मों, अहंकार और मोह के कारण इसे मैला कर लेते हैं। कबीर जी की वाणी सीधी हृदय को छूती है और आत्मचिंतन के लिए मजबूर कर देती है।
यह भजन सत्संग, भजन-कीर्तन और आध्यात्मिक साधना में विशेष रूप से गाया जाता है।

चदरिया झीनी रे झीनी लिरिक्स
दोहा- कबीरा जब हम पैदा हुए,
जग हँसे हम रोये,
ऐसी करनी कर चलो,
हम हँसे जग रोये ।
चदरिया झीनी रे झीनी,
राम नाम रस भीनी,
चदरीया झीनी रे झीनी ॥
अष्ट कमल का चरखा बनाया,
पांच तत्व की पूनी,
नौ दस मास बुनन को लागे,
मूरख मैली किनी,
चदरीया झीनी रे झीनी,
राम नाम रस भीनी,
चदरीया झीनी रे झीनी ॥
जब मोरी चादर बन घर आई,
रंगरेज को दिनी,
ऐसा रंग रंगा रंगरे ने,
के लालो लाल कर दिनी,
चदरीया झीनी रे झीनी,
राम नाम रस भीनी,
चदरीया झीनी रे झीनी ॥
चादर ओढ़ शंका मत करियो,
ये दो दिन तुमको दिनी,
मूरख लोग भेद नहीं जाने,
दिन दिन मैली किनी,
चदरीया झीनी रे झीनी,
राम नाम रस भीनी,
चदरीया झीनी रे झीनी ॥
ध्रुव प्रहलाद सुदामा ने ओढ़ी,
शुकदेव ने निर्मल किनी,
दास कबीर ने ऐसी ओढ़ी,
ज्यो की त्यों धर दिनी,
चदरीया झीनी रे झीनी,
राम नाम रस भीनी,
चदरीया झीनी रे झीनी ॥
चदरीया झीनी रे झीनी,
राम नाम रस भीनी,
चदरीया झीनी रे झीनी ॥
भजन का भावार्थ (सरल शब्दों में)
इस भजन में कबीर जी कहते हैं कि जब मनुष्य इस संसार में जन्म लेता है, तब वह रोता है और दुनिया हँसती है, लेकिन जीवन ऐसा होना चाहिए कि जाते समय व्यक्ति हँसे और दुनिया उसे याद करके रोए।
“चदरिया” यहाँ मानव शरीर और आत्मा का प्रतीक है। ईश्वर ने इस चादर को बहुत ही कोमल, निर्मल और पवित्र बनाकर भेजा है। यह चादर पाँच तत्वों से बनी है और माँ के गर्भ में नौ महीने तक बुनी जाती है।
लेकिन मनुष्य अपने गलत कर्मों, अहंकार, लोभ और मोह के कारण इस चादर को मैला कर देता है। कबीर जी समझाते हैं कि यह चादर केवल कुछ समय के लिए मिली है, इसलिए इसे संभालकर रखना चाहिए।
भजन में बताया गया है कि ध्रुव, प्रह्लाद और सुदामा जैसे भक्तों ने अपनी चादर को निर्मल रखा और उसी पवित्रता के साथ प्रभु को सौंप दिया। कबीर जी भी कहते हैं कि उन्होंने अपनी चादर को जैसा पाया, वैसा ही लौटा दिया।
इस भजन का संदेश यह है कि जीवन स्थायी नहीं है, यह केवल कुछ समय के लिए मिला हुआ अवसर है। शरीर नश्वर है और एक दिन नष्ट हो जाता है, लेकिन आत्मा अमर होती है। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन में ऐसे कर्म करने चाहिए जो उसकी आत्मा को शुद्ध रखें। सच्ची भक्ति बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि अच्छे विचारों, सच्चे कर्मों और निर्मल मन में होती है। अंत में वही व्यक्ति याद रखा जाता है, जिसके कर्म अच्छे होते हैं, क्योंकि कर्म ही मनुष्य की असली पहचान बनते हैं।
FAQ – चदरिया झीनी रे झीनी भजन से जुड़े प्रश्न
1. “चदरिया झीनी रे झीनी” का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है — जीवन रूपी चादर बहुत नाजुक और पवित्र है, इसे गलत कर्मों से मैला नहीं करना चाहिए।
2. इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?
भजन का मुख्य संदेश है कि मनुष्य को अपना जीवन शुद्ध, सादा और ईमानदार रखना चाहिए, क्योंकि अंत में वही कर्म साथ जाते हैं।
3. कबीर जी चादर को प्रतीक क्यों मानते हैं?
कबीर जी के अनुसार चादर मानव शरीर और आत्मा का प्रतीक है, जिसे ईश्वर ने पवित्र बनाकर भेजा है।
4. यह भजन कब गाया जाता है?
यह भजन प्रायः
✔️ सत्संग
✔️ भजन-कीर्तन
✔️ आध्यात्मिक प्रवचन
✔️ कबीर जयंती
के अवसर पर गाया जाता है।
5. इस भजन से हमें क्या सीख मिलती है?
- जीवन क्षणभंगुर है
- अहंकार से दूर रहना चाहिए
- कर्म शुद्ध होने चाहिए
- आत्मा को पवित्र रखना ही सच्चा धर्म है
निष्कर्ष
“चदरिया झीनी रे झीनी” केवल एक भजन नहीं, बल्कि जीवन का आईना है। यह हमें सिखाता है कि यह शरीर और जीवन ईश्वर की अमानत है, जिसे हमें संभालकर रखना चाहिए। जो व्यक्ति इस भजन के भाव को समझकर जीवन जीता है, वह सच में आत्मिक शांति और संतोष प्राप्त करता है।