“जगत में कोई न परमानेंट” एक प्रभावशाली वैराग्य भजन है, जो सरल भाषा और हल्के व्यंग्य के माध्यम से जीवन का गहरा सत्य समझा देता है। यह भजन हमें याद दिलाता है कि संसार में कोई भी वस्तु, पद, रूप या संबंध स्थायी नहीं है।
तेल, साबुन, इत्र, पद-प्रतिष्ठा, सत्ता, यात्रा और दिखावा — सब यहीं रह जाते हैं। अंत समय में केवल कर्म और प्रभु का नाम ही साथ जाता है। यही संदेश यह भजन हँसाते-हँसाते मन में उतार देता है।
यह भजन विशेष रूप से सत्संग, वैराग्य सभा, भजन संध्या और आत्मचिंतन के अवसरों पर गाया जाता है।


जगत में कोई न परमानेंट लिरिक्स
जगत में कोई ना परमानेंट,
जगत में कोई ना परमानेंट,
तेल चमेली चन्दन साबुन,
तेल चमेली चन्दन साबुन,
चाहे लगालो सेंट,
जगत में कोईं ना परमानेंट,
जगत में कोईं ना परमानेंट ॥
आवागमन लगा दुनिया में,
जगत है रेस्टोरेंट,
रे प्यारे जगत है रेस्टोरेंट,
अंत समय में उड़ जाएंगे,
अंत समय में उड़ जाएंगे,
तेरे तम्बू टेंट,
जगत में कोईं ना परमानेंट,
जगत में कोईं ना परमानेंट ॥
राष्ट्रपति हो कर्नल जनरल,
या हो लेफ्टिनेंट,
रे प्यारे या हो लेफ्टिनेंट,
काल सभी को खा जाएगा,
काल सभी को खा जाएगा,
लेडीज हो या जेंट्स,
जगत में कोईं ना परमानेंट,
जगत में कोईं ना परमानेंट ॥
हरिद्वार चाहे, काशी मथुरा*,
घूमो दिल्ली केंट,
रे प्यारे घूमो दिल्ली केंट,
मन में नाम प्रभु का राखो,
मन में नाम प्रभु का राखो,
धोती पहनो या पेंट,
जगत में कोईं ना परमानेंट,
जगत में कोईं ना परमानेंट ॥
साधू संत की संगत करलो ,
ये सच्ची गोरमेंट,
रे प्यारे ये सच्ची गोरमेंट,
'लाल सिंह' कहे इस दफ्तर से,
'लाल सिंह' कहे इस दफ्तर से’,
मत होना एब्सेंट,
जगत में कोईं ना परमानेंट,
जगत में कोईं ना परमानेंट ॥
जगत में कोई ना परमानेंट,
जगत में कोई ना परमानेंट,
तेल चमेली चन्दन साबुन,
तेल चमेली चन्दन साबुन,
चाहे लगालो सेंट,
जगत में कोईं ना परमानेंट,
जगत में कोईं ना परमानेंट ॥
भावार्थ (सरल शब्दों में)
इस भजन का भाव यह है कि संसार एक अस्थायी ठहराव है, जैसे कोई रेस्टोरेंट या तंबू-टेंट। मनुष्य यहाँ थोड़े समय के लिए आता है और फिर चला जाता है। चाहे कोई कितना भी साज-सिंगार कर ले, कितना ही बड़ा पद पा ले — राष्ट्रपति हो या सामान्य व्यक्ति — मृत्यु सबको समान रूप से आ घेरती है।
भजन यह भी समझाता है कि तीर्थों की यात्रा, कपड़ों का बाहरी रूप या सामाजिक पहचान से अधिक महत्वपूर्ण है मन में प्रभु का नाम बसाना। साधु-संतों की संगत को सच्ची “सरकार” बताया गया है, क्योंकि वही हमें सत्य का मार्ग दिखाती है।
अंत में भजन चेतावनी देता है कि इस संसार रूपी दफ्तर से कोई अनुपस्थित न हो — यानी जीवन को व्यर्थ न गँवाए, समय रहते भजन और नाम-स्मरण कर ले।
निष्कर्ष
“जगत में कोई न परमानेंट” भजन सरल शब्दों में जीवन का सबसे बड़ा सत्य समझा देता है। यह हमें अहंकार, मोह और दिखावे से बाहर निकालकर प्रभु स्मरण की ओर ले जाता है। जो व्यक्ति इस भजन के भाव को जीवन में उतार लेता है, वह संसार में रहते हुए भी वैराग्य और शांति का अनुभव करता है।