“सज रहे भोले बाबा निराले दूल्हे में” एक अत्यंत लोकप्रिय और आनंद से भरपूर शिव भजन है, जिसमें भगवान शिव के विवाह का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत किया गया है। यह भजन शिव की अनोखी लीला, उनके वैराग्य और उनके निराले स्वरूप को बड़े ही रोचक और भक्तिपूर्ण ढंग से दर्शाता है।

इस भजन में शिव को ऐसे दूल्हे के रूप में दिखाया गया है, जो न तो राजसी ठाठ में हैं और न ही किसी दिखावे में, बल्कि भूतों की बारात, भस्म, जटा, नाग और डमरू के साथ अपनी ससुराल जाते हैं। यही शिव की विशेषता है — सरलता, वैराग्य और अलौकिकता।
यह भजन विशेष रूप से महाशिवरात्रि, सावन, शिव विवाह कथा और भजन संध्या में बड़े उत्साह से गाया जाता है।

सज रहे भोले बाबा निराले दूल्हे में लिरिक्स
निराले दूल्हे में मतवाले दूल्हे में,
सज़ रहे भोले बाबा निराले दूल्हे में,
देखो भोले बाबा की अजब है बात,
चले हैं संग ले कर के भूतों की बारात,
सज रहे भोले बाबा निराले दूल्हे में,
है भेष निराला, जय हो पीये भंग का प्याला, जय हो
सर जटा चढ़ाएं , जय हो तन भष्म लगाए, जय हो
ओढ़े मृगछाला, जय हो गले नाग की माला, जय हो
है शीश पे गंगा, जय हो मस्तक पे चंदा, जय हो
तेरे डमरुँ साजे, जय हो त्रिशूल विराजे, जय हो
भूतों की लेके टोली, चले हैं ससुराल,
शिव भोले जी दिगंबर, हो बैल पे सवार,
सज रहे भोले बाबा निराले दूल्हे में,
नित रहें अकेले, जय हो शंकर अलबेले, जय हो
हैं गुरु ज़गत के, जय हो नहीं किसी के चेले, जय हो
है भांग का जंगल, जय हो जंगल में मंगल, जय हो
भूतों की पलटन, जय हो आ गयी है बन ठन, जय हो
ले बांग का गठ्ठा, जय हो ले कर सिल बट्टा, जय हो
सब घिस रहें है, जय हो हो हक्का बक्का, जय हो
पी कर के प्याले, जय हो हो गए मतवालें, जय हो
कोई नाचें गावे, जय हो कोई ढ़ोल बजावे, जय हो
कोई भाव बतलावे, जय हो कोई मुंह पिचकावे, जय हो
भोले भंडारी, जय हो पहुंचे ससुरारी, जय हो
सब देख के भागे, जय हो सब नर और नारी, जय हो
कोई भागे अगाड़ी, जय हो कोई भागे पिछाड़ी, जय हो
खुल गयी किसी की, जय हो धोती और साड़ी, जय हो
कोई कूदे खम्बम, जय हो कोई बोले बम बम, जय हो
कोई कद का छोटा, जय हो कोई एकदम मोटा, जय हो
कोई तन का लम्बा, जय हो कोई ताड़ का खम्बा, जय हो
कोई है इक टंगा, जय हो कोई बिलकुल नंगा, जय हो
कोई एकदम काला, जय हो कोई दो सीर वाला, जय हो
‘शर्मा’ गुण गए, जय हो मन में हर्षाए, जय हो
त्रिलोक के स्वामी, जय हो क्या रूप बनाए, जय हो
भोले के साथी, जय हो हैं अजब बराती, जय हो
भूतों की ले कर टोली चले हैं ससुराल,
शिव भोले जी दिगंबर हो बैल पे सवार,
सज रहे भोले बाबा निराले दूल्हे में,
भावार्थ (सरल शब्दों में)
इस भजन में भगवान शिव को एक ऐसे दूल्हे के रूप में दर्शाया गया है, जिनका स्वरूप संसार के सामान्य नियमों से बिल्कुल अलग है। वे भस्म लगाए हुए, जटाधारी, नागों की माला पहने हुए और भूतों की बारात के साथ विवाह के लिए निकलते हैं। उनके साथ न कोई शाही ठाठ है और न ही सांसारिक दिखावा, फिर भी उनका तेज और महिमा सबसे अलग है।
माता पार्वती के साथ उनका विवाह यह दर्शाता है कि सच्चा संबंध बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि आत्मिक जुड़ाव से बनता है। भूत, प्रेत, गण, योगी और तपस्वी सभी शिव की बारात में शामिल होते हैं, जो यह दिखाता है कि शिव सबको समान भाव से स्वीकार करते हैं।
यह भजन हमें सिखाता है कि
ईश्वर रूप और वैभव से नहीं, बल्कि भाव और भक्ति से प्रसन्न होते हैं।
शिव का जीवन वैराग्य, सरलता और सत्य का प्रतीक है।
FAQ – सज रहे भोले बाबा निराले दूल्हे में भजन
1. यह भजन किस विषय पर आधारित है?
यह भजन भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह प्रसंग पर आधारित है।
2. इस भजन में शिव को निराला दूल्हा क्यों कहा गया है?
क्योंकि शिव न तो राजसी वस्त्र पहनते हैं और न ही सांसारिक आडंबर अपनाते हैं। वे भस्म, जटा, नाग और भूतों की बारात के साथ विवाह करने जाते हैं, जो उन्हें सबसे अलग बनाता है।
3. यह भजन कब गाया जाता है?
यह भजन महाशिवरात्रि की पावन रात में, सावन के पवित्र महीने में, शिव विवाह की कथा के समय और भजन संध्या के अवसर पर गाया जाता है, जब भक्तों का मन पूरी तरह भोलेनाथ की भक्ति में डूब जाता है। ढोलक की थाप और भक्ति रस में डूबे स्वर जब गूंजते हैं, तो ऐसा लगता है मानो स्वयं भोले बाबा अपनी निराली बारात के साथ पधार रहे हों और हर हृदय को अपने प्रेम से भर रहे हों।
4. इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?
इस भजन का संदेश है कि सच्ची भक्ति सादगी में होती है, और ईश्वर को दिखावे से नहीं बल्कि सच्चे मन से पाया जा सकता है।
5. यह भजन हमें क्या सिखाता है?
यह भजन हमें यह गहरी सीख देता है कि सच्चा प्रेम हमेशा त्याग और समर्पण से भरा होता है, जहाँ अपनेपन के आगे अहंकार का कोई स्थान नहीं रहता। भक्ति तभी सार्थक होती है जब उसमें दिखावा न होकर सच्चा भाव हो। शिव जैसे वैरागी यह सिखाते हैं कि योग और साधना का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि उससे ऊपर उठकर सबको समान दृष्टि से देखना है। उनके लिए न कोई बड़ा है न छोटा, न अमीर न गरीब — सब उनके लिए समान हैं। यही कारण है कि भोलेनाथ को करुणा और समता का प्रतीक माना जाता है।
निष्कर्ष
“सज रहे भोले बाबा निराले दूल्हे में” भजन केवल एक विवाह गीत नहीं है, बल्कि यह शिव के वैराग्य, सरलता और दिव्यता का सुंदर चित्रण है। यह भजन हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि मन की पवित्रता से होती है। जब श्रद्धा सच्ची हो, तो भोलेनाथ स्वयं भक्त के जीवन को आनंद से भर देते हैं।